My Poems, Nation

नेताजी

हाइकु सत्रह (१७) अक्षर में लिखी जाने वाली सबसे छोटी कविता है। इसमें तीन पंक्तियाँ रहती हैं। प्रथम पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी में ७ और तीसरी में ५ अक्षर रहते हैं। संयुक्त अक्षर को एक अक्षर गिना जाता है, जैसे ‘सुगन्ध’ में तीन अक्षर हैं – सु-१, ग-१, न्ध-१) तीनों वाक्य अलग-अलग होने चाहिए। अर्थात एक ही वाक्य को ५,७,५ के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि तीन पूर्ण पंक्तियाँ हों।
मैंने पहले भी हाइकू कविता लिखी हैं, पर वे इस नियमपर खरी नहीं उतरती! प्रयास है हाइकु के नियमानुसार लिखने का , उसी सन्दर्भ में :

हाइकु 
जन्म जयंती 
सुभाष चंद्र बोस 
अमर रहें 

23 Jan 2021

-रविन्द्र कुमार करनानी
rkkblog1951.wordpress.com  
© Ravindra Kumar Karnani

Life, My Poems, My Text, Nation, Positivity, relationship, Self-development

वसुधैव कुटुम्बकम्

वसुधैव कुटुम्बकम्
मेरा ऐसा मानना है कि समाज में पहले से अधिक भाईचारा है और विशेष कर कोरोना काल के प्रादुर्भाव से और भी बढ़ा है |  परिवार से शुरुवात होकर पास पड़ोस, फिर मकान या कॉम्प्लेक्स और फिर अपने समाज ,शहर आदि में इस भाईचारे का फैलाव दुनिया के सभी वृद्धाश्रमों को बंद करने की शक्ति  रखता है| लॉकडाउन के समय के अपने अनुभव से मन में आये  विचारों को शब्द दिए थे वही साझा कर रहा हूँ | शुरुवात मैंने जरूर अपने समाज का नाम लेकर की है क्योंकि इसे ही मैंने नजदीक से देखा है पर मेरे अनुसार यही  हर समाज का सच है, कहीं बहुत कहीं कुछ कम ! 
और सबसे अहम् बात जिसे कहने का प्रयास कर रहा हूँ वो है की वसुधैव कुटुम्बकम् साकार होने की पहली पायदान है संयुक्त परिवार!

management funda: \'vasudev kutumbakam\' is an Evergreen Idea | 'वसुधैव  कुटुम्बकम' एक सदाबहार विचार है! - Dainik Bhaskar

संयुक्त परिवार की चाह 
(वसुधैव कुटुम्बकम् की ओर पहला कदम)

मेरा मारवाड़ी समाज
है प्राचीन,है नवीन
अत्युत्तम,विलक्षण,अनोखा
अनेकता में एकता
अग्रवाल,माहेश्वरी,ओसवाल
जैन,गोयल,खंडेलवाल
विभिन्नता पर एकता
मानों भारत कीअनेकता में एकता का  
हो एक नन्हा सा प्रतीक।

सब हैं 
अलग अलग परिपाटी के सूचक
परम्पराएं हैं पर रूढ़ि से परे
रीति रिवाज़ हैं
पर लकीर की फकीरी नहीं।
अपने अपने धर्मों  का  निर्वाह
अपने अपने अनुसार
प्रेम और भाईचारे में
आड़े नहीं आता  
इसका कोई विचार।

गावों में,कस्बों में
ये सब है आम बात
पर शहर की व्यस्तता में भी
जब यह नज़र आती
बात हो जाती ख़ास।
बड़े बड़े काम्प्लेक्स हों
या एक अकेला मकान 
जैसे 142 ब्लाक A 
लेक टाउन के सामान 
सारे मिल हर जश्न मनाते
छोटों का जन्मदिन हो
या बड़ों को देना हो मान।
यह सब कर पाना
हमारे आदि संस्कारों में
भर देते नित नई जान
बच्चों को सिखाते
भारत की संस्कृति को
देना उचित मान।

एक और है जो बात 
मैंने अभी नहीं कही 
यहाँ,असीम दुःख में भी 
कोई अकेला होता नहीं। 
मुश्किलें यहाँ कभी किसी
एक अकेले की होती नहीं
जब कंधे से कंधा मिल जाता
हर विपदा हो जाती सही।
अलग अलग होकर भी
संयुक्त से  हो जाते  परिवार
बच्चे सहज ही सीख जाते यहाँ
सेवा सत्कार स्नेह और प्यार।

मकान हो या काम्प्लेक्स
इनमें परिवारों का ऐसा परिप्रेक्ष्य
काश ये उमड़ कर
सैलाब बन
पूरे समाज को बहा ले जाय
पुनः संयुक्त परिवारों की ओर
बंद हो जाएँ वृद्धाश्रम चहुँ ओर।  

-रविन्द्र कुमार करनानी
30 जून 2020

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प्रियं भारतम्

This Sanskrit song by Dr. Chandrabhanu Tripathi sung by Gabriella Brunnel . Click on her name to view the video. It has gone viral on social media and when we watch it we know why!
Below are the lyrics : 

प्रियं भारतम्

प्रकृत्या सुरम्यं विशालं प्रकामम्
सरित्तारहारैः ललामम् निकामम्
हिमाद्रिः ललाटे पदे चैव सिन्धुः
प्रियं भारतं सर्वथा दर्शनीयम्

धनानां निधानं धरायां प्रधानम्
इदं भारतं देवलोकेन तुल्यम्
यशो यस्य शुभ्रं विदेशेषु गीतम्
प्रियं भारतं तत् सदा पूजनीयम्.

अनेके प्रदेशा अनेके च वेषाः
अनेकानि रूपाणि भाषा अनेकाः
परं यत्र सर्वे वयं भारतीयाः
प्रियं भारतं तत् सदा रक्षणीयम्

सुधीरा जना यत्र युद्धेषु वीराः
शरीरार्पणेनापि रक्षन्ति देशम्
स्वधर्मानुरक्ताः सुशीलाश्च नार्यः
प्रियं भारतं तत् सदा श्लाघनीयम्

वयं भारतीयाः स्वभूमिं नमामः
परं धर्ममेकं सदा मानयामः
यदर्थं धनं जीवनं चार्पयामः
प्रियं भारतं तत् सदा वन्दनीयम्

 

This is link to a blog that has the meaning of this beautiful song.

https://shyamapatil.blogspot.com/2019/02/prakrtya-suramyam-visalam-prakamam.html