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कोविड 19 को मात 

पूरे सात महीने पूरी तरह से सारे नियम मानते हुवे घर पर रहे ताकि कोविड संक्रमण से बचे रहें | पर 15 अक्टूबर को घर पर मेरी बड़ी बहन, पत्नी और मुझे तीनों  को ही एक साथ संक्रमित पाया गया | असमंजज में थे क्या करें, छोटी बेटी बोली मैं आ जाती हूँ , पूरे ऐतिहात बरत कर आप तीनो की देखभाल कर लूंगी, पर कोई कारण नहीं था कि उसे बुलायें | दूसरा विकल्प था की तीनों अस्पताल में भर्ती हो जाएँ पर वहां के हाल चाल सुन सुन कर भय था |  फिर हमारे पड़ोसी  बोले आप लोग थोड़ी हिम्मत से काम लेवें, इलाज़ बखूबी घर पर ही हो जायेगा | बाहर का सारा काम और खाने पीने की जिम्मेवारी हमारी है |  करीब 10-12 दिन तक बहुत तकलीफ पाए पर तकलीफ शारीरिक ही रही मानसिक नहीं थी| कोई तनाव नहीं था की घर पर इलाज़ कैसे पार पड़ेगा |  फैमिली डॉक्टर साहब ने फोन पर ही इलाज़ शुरू कर दिया , एक डाकटर को घर भी भेजा हमारे चेक अप के लिए |  हमें तो बस दवा भाप अदि लेनी थी और आराम करना था , इसके अलावा एक ही काम था की निर्धारित समय पर मेन  गेट खोलकर नाश्ता, खाना आदि उठा लो ! हाँ एक काम और था कि  पड़ोसी मित्र का फ़ोन उठाकर उन्हें बताना की हमारी क्या क्या खाने की रूचि है! दवा आदि या अन्य किसी वस्तु की ज़रुरत है है तो व्हाट्सप्प पर मेसेज कर दो , बाकी काम स्वतः ही हो रहा था |  ठाकुर की बड़ी कृपा है की हमें इतने अच्छे पडोसी मित्र परिवार मिला ! पूरे परिवार ही जैसे हमारी सेवा सुश्रुषा में लगा था !  हमारे ढेरों आशीष है उन सभी  के लिए !  इसी दौरान कुछ लिखा था वही साझा कर रहा हूँ| 

कोविड 19 को मात
किया नहीं कोविड का स्वागत  हमने आतिथ्य भुलाकर
हाथ जरूर जोड़े थे लम्बे लम्बे, दूर रहो यह कह कर
हाँ डरे डरे सहमे सहमे,समय बिताया घर पर रहकर
ना हम ही गये किसे के घर ना मिला ही कोई आकर
फिर भी ना जाने किस रस्ते वो घुस आई पांव दबाकर
जो ना मुमकिन लगता था हो गया वही पंद्रह अक्टूबर
सबके कोविड पॉजिटिव आया हम तीन थे जो घर पर
वो समझ रही थी तड़पेंगे हम नयनों से नीर बहा कर
उसे क्या पता हमारा पड़ोस से प्रेम है कितना ताकतवर
नाश्ते से लेकर रात्रि भोजन,गर्म गर्म मिलता हमें द्वार पर
दवा,दूध,ब्रेड बिस्कुट या अन्य सामान लाना हो घर पर
तुरत फुरत हाज़िर हो जाता कहने की ही बस देर भर
बिना निमंत्रण जोर जबर वो घर में घुसी छुप छुप कर
दवा काढ़ा भाप और  प्रभु कृपा से मरी वो घुट घुट कर
दस दिन लगे अति कष्टकर थे पर गए कई पाठ समझाकर
अपने अपनी जगह हैं,चलें पडोसी की अहमियत मानकर
साथ साथ हो इन्सां करोना क्या बिगाड़ेगी सर पटककर
हाथ धोयें,मास्क पहनें,आम जगह में दूरी रखें बनाकर
फिर भी अगर कोविड आजाये उद्विग्न ना हों घबराकर
सकारात्मकता से इलाज़ करायें प्रभु साथ खड़े हैं बराबर |
-रविन्द्र कुमार करनानी
02.11.2020

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आभारी द्रुम

शब्द ज्ञान श्रृंखला 
आज का शब्द : द्रुम = वृक्ष, पेड़

श्री जयशंकर प्रसाद की कामायनी से…  
कीर्ति, दीप्ती, शोभा थी नचती
अरूण-किरण-सी चारों ओर,
सप्तसिंधु के तरल कणों में,
द्रुम-दल में, आनन्द-विभोर।

आज से पहले मैंने “द्रुम” शब्द केवल शिव जी स्तुति में ही सुना,पढ़ा है और वह भी बचपन से |
“कलद्रुम अरु पारिजात तरु लाग रहे हैं लक्षासी”…….शिवजी के आस पास के वातावरण का वर्णन है |  
पर जब उसका अर्थ पढ़ते हैं : द्रुम=पेड़ या वृक्ष तब सहसा “चिपको आंदोलन” ही याद आता है |  उस आंदोलन से जुडी महिला हो या पुरुष आज शिवजी से कम आदरणीय नहीं हैं |  एक अकेले चिपको आंदोलन ने पेड़ बचाने की मुहिम पूरे विश्व में फैला दी थी |

आभारी द्रुम

ये द्रुम,वो द्रुम, मैं द्रुम, सब द्रुम मिलते तो जंगल बनता है
मेरी कीमत क्या जाने शहरी, वो जाने जो मुझमें  रमता है
वो जानता मेरे सचमुच के उपकार,मिटटी पानी और बयार  
मानता भी दिल से आभार ये तीनों उसके जीने के हैं आधार
एक काटने को तत्पर है अधिकारियों की जो जेब भरता है
दूजा मरने को तत्पर है, मेरा उपकार मान पूजा करता है
हम सब बिन अंधड़ तूफ़ान के थर थर काँप जाया  करते थे
अपनी और बढ़ते आरों,ट्रकों ,डम्परों की सेना को तकते थे
तुमने ही नहीं मनुष्य हमने भी  वात्सल्य की ऊष्मा पाई है
चिर कृतज्ञ हम हर उस महिला के जो छाती से हमें लगाईं है
“चिपको” ना होता तो ना हम होते ना इस दुनिया में इतने द्रुम
आने वाली पीढ़ी के लिए हम भी होते डायनासोर की तरह गुम

-रविन्द्र कुमार करनानी
07 Oct 2020
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Humour, My Text, Sattire

सत्य

सत्य

मैं जो कहूंगा सत्य कहूंगा सत्य के सिवा कुछ नहीं कहूंगा
मैं जो कहूंगा सत्य के सिवा कहूंगा सत्य कुछ नहीं कहूंगा 

-रविन्द्र कुमार करनानी 
05 Oct 2020
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Humour, My Poems, My Text

चिकुर में छिपा चाँद

शब्द ज्ञान : 001

हिन्दी का मेरा शब्द ज्ञान बहुत सीमित है !  आम इस्तेमाल के शब्दों से अपनी तुकबंदियाँ  करता हूँ| कोई नया शब्द मिलने पर सीखने का श्रम भी करता हूँ , पर आजकल याददास्त कमजोर हो चली है इसलिए सोचा की यदि मैं  शब्दों का प्रयोग करूँ  अधिक समय मस्तिष्क में रहेंगे |  इसी श्रृंखला में है आज ये पहला प्रयास ! 
नया शब्द : चिकुर (केश ,बाल )
“अम्बर पर मोती-गुथे चिकुर फैला कर,
अंजन उँड़ेल सारे जग को नहला कर,
साड़ी में टाँकें हुए अनन्त सितारे,
थी घूम रही तिमिरांचल निशा पसारे।”
रश्मिरथी – पांचवां सर्ग – श्री रामधारी सिंह दिनकर
चिकुर पर  प्रायः  कवितायें  स्त्रियों के केश, लटें, गेसू आदि के  सन्दर्भ  में ही लिखी गई हैं| मुझे लगा कि पुरुषों को भी तो अपने ‘चिकुर’ से उतना ही लगाव है अगर अधिक ना भी हो तो , इसीलिए जरा सा हट कर लिखने का प्रयास है।   


चिकुर में छिपा चाँद

मेरे चिकुर रहते सर पर जैसे अमावस फैलाये 
समय के साथ श्वेत संकीर्ण नदियाँ नज़र आयें 
कुछ चिकुर नित विदा ले रहे अब पृष्ट भाग से 
मानों एकम का चन्दा आरहा बाद अमावस के 
शनैः शनैः  चिकुर गर साथ मेरा यूँ छोड़ जाएंगे
स्वयं अस्त हों चाँद ही मस्तक मेरे उदय पायेंगे | 

-रविन्द्र कुमार करनानी 
30 Sep 2020 
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अपनी बहुमूल्यता पहचान!

एक उद्धरण पढ़ा सोशल मीडिया पर :

“कभी कभी किसी के शब्द इतने चुभ जाते हैं कि हम चुप से हो जाते हैं और सोचते हैं ,क्या हम वाकई इतने बुरे हैं ??”

और जैसा आम नित्य क्रम है लोगों के  “Like” की भरमार|मुझे यह कुछ काम समझ आया तो मैंने अपना दृष्टिकोण कुछ यूँ रखा :
Do not be puppets of other peoples view about you…do not get carried away…they can only evaluate as per their thinking and perspective….so chill! You are how you honestly evaluate yourself!

अपनी बहुमूल्यता पहचान!

स्वयं को यूँ औरों की नज़रों से इतना हीन मत आँक,
असली कीमत जानता केवल जो आईने से रहा झाँक  
तू भले ही चुप रहे और अपने मन पर ना होने दे असर,
वो लोग तुझे अपनी छोटी सोच और नज़रिये से रहे माप!
मत पड़ने दे अपनी शख्शियत पर ऐसे लोगों की  छाप 
मत मान पुरानी कहावत: हीरा नहीं जानता अपनी कीमत 
हृदयंगम हो,खुद को परख, सच्ची बहुमूल्यता अपनी भाँप! 

-रविन्द्र कुमार करनानी 
29 Sep 2020 
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