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Life, My Poems

क्षणभंगुरता

क्षणभंगुरता  
क्षणभंगुरता की सीख लेनी,लेलो बूंदों से ओस की
अपने अस्तित्व भर वो केवल ख़ुश रहतीं  नाचतीं  
पत्तों पे मोतीसी इठलाती, नवयौवना सी बलखाती
काँटो की नोक या पत्तों की कोर पर ठहर सी जाती
जाने से पहले हीरे सी चमक,आभा अपनी बिखराती
हौले से टपक,यूँही हँसते हुवे, वो मिट्टी में मिल जाती !
 -रविन्द्र कुमार करनानी28 Jan 2021 
rkkblog1951.wordpress.com  
© Ravindra Kumar Karnani  

My Poems

विभावरी

हिन्दी का मेरा शब्द ज्ञान बहुत सीमित है !  आम इस्तेमाल के शब्दों से अपनी तुकबंदियाँ  करता हूँ| कोई नया शब्द मिलने पर सीखने का श्रम भी करता हूँ , पर आजकल याददास्त कमजोर हो चली है इसलिए सोचा की यदि मैं  शब्दों का प्रयोग करूँ  अधिक समय मस्तिष्क में रहेंगे|इस काम की प्रेरणा मिली Facebook के Anugoonj (अनुगूँज ) ग्रुप से ! इसी श्रृंखला में है ये प्रयास ! 

नया शब्द : विभावरी – (तारों भरी रात्रि)

विभावरी – (तारों भरी रात्रि)

चहुँ ओर पसरी चाँदनी
तारों का साथ दे रही
मीलों फैली रातरानी पर
चमक अपनी उड़ेल रही|

रातरानी सर उठाये
तक रही विभावरी
दूर तक सौरभ ले जाने
मंद पवन बह रही |

रात रानी सोचती
देखकर विभावरी
हमारे संग खेलने
नीचे नहीं आ रही |

वो रात भर चमकेगी
मैं रात भर महकूँगी
पूरे दिनभर मैं उसकी
एक झलक को तरसूंगी|

चमचमाती आँखों में
स्नेह भर कह उठी
मदमाती गंध पाती
दूर से विभावरी
मैं भी इतना ही तरसूं
अरी मेरी बावरी !

-रविन्द्र कुमार करनानी
22 Sep 2020
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© Ravindra Kumar Karnani

My Poems, Personalised Poems

21

बोलचाल में कोई वस्तु निम्न हो तो कहते हैं थोड़ी उन्नीस है, और बेहतर हो तो बीस और उत्तम हो तो कहते हैं की ये इक्कीस है! 
अभी बिटिया के विवाह की  २१ वीं  साल गिरह गई , उसी पर बधाई स्वरुप ये कविता लिख भेजी थी उसे ! 

इक्कीस 
इक्कीस है बिटिया रचना
इक्कीस है बृजेश  हमारा
इक्कीस है इनकी जोड़ी
रहे जीवन में उजियारा |  

इक्कीस ही हैं वन्नी पीयू
इक्कीस है पूरा परिवार
ठाकुर की कृपा रहे ऐसी
सदा इक्कीस रहें विचार |

इक्कीस वीं आई a’sary
इक्कीस रहे सदा सौभाग्य
इक्कीस रहे प्यार दोनों का
सदा मिले उन्नति का मार्ग |
-पापा-माँ के अनंत आशीष 

My Poems

बहिर्मुखी हों !

“जो ज़ाहिर करना पड़े वो दर्द कैसा और जो दर्द ना समझ सके वो हमदर्द कैसा!” 
सोशल मीडिया पर ये पढ़ा,पर मुझे लगता है कि दर्द को मुखर होकर कहने में हर्ज़ नहीं है !

बहिर्मुखी हों !
गलत है बहुत, दर्द को भीतर पालना
ना समझने वाले को हमदर्द ना मानना  
समय बदल गया,अपनी  सोच बदलें
कोई नहीं समझें तो हो मुखर कह दें !
हाँ फिर निर्णय लेने आप है पूर्ण स्वतंत्र
दर्द अपनों से साझा करें या करें अन्यंत्र

  -रविन्द्र कुमार करनानी

28 Sep 2020 
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© Ravindra Kumar Karnani