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वसुधैव कुटुम्बकम्

वसुधैव कुटुम्बकम्
मेरा ऐसा मानना है कि समाज में पहले से अधिक भाईचारा है और विशेष कर कोरोना काल के प्रादुर्भाव से और भी बढ़ा है |  परिवार से शुरुवात होकर पास पड़ोस, फिर मकान या कॉम्प्लेक्स और फिर अपने समाज ,शहर आदि में इस भाईचारे का फैलाव दुनिया के सभी वृद्धाश्रमों को बंद करने की शक्ति  रखता है| लॉकडाउन के समय के अपने अनुभव से मन में आये  विचारों को शब्द दिए थे वही साझा कर रहा हूँ | शुरुवात मैंने जरूर अपने समाज का नाम लेकर की है क्योंकि इसे ही मैंने नजदीक से देखा है पर मेरे अनुसार यही  हर समाज का सच है, कहीं बहुत कहीं कुछ कम ! 
और सबसे अहम् बात जिसे कहने का प्रयास कर रहा हूँ वो है की वसुधैव कुटुम्बकम् साकार होने की पहली पायदान है संयुक्त परिवार!

management funda: \'vasudev kutumbakam\' is an Evergreen Idea | 'वसुधैव  कुटुम्बकम' एक सदाबहार विचार है! - Dainik Bhaskar

संयुक्त परिवार की चाह 
(वसुधैव कुटुम्बकम् की ओर पहला कदम)

मेरा मारवाड़ी समाज
है प्राचीन,है नवीन
अत्युत्तम,विलक्षण,अनोखा
अनेकता में एकता
अग्रवाल,माहेश्वरी,ओसवाल
जैन,गोयल,खंडेलवाल
विभिन्नता पर एकता
मानों भारत कीअनेकता में एकता का  
हो एक नन्हा सा प्रतीक।

सब हैं 
अलग अलग परिपाटी के सूचक
परम्पराएं हैं पर रूढ़ि से परे
रीति रिवाज़ हैं
पर लकीर की फकीरी नहीं।
अपने अपने धर्मों  का  निर्वाह
अपने अपने अनुसार
प्रेम और भाईचारे में
आड़े नहीं आता  
इसका कोई विचार।

गावों में,कस्बों में
ये सब है आम बात
पर शहर की व्यस्तता में भी
जब यह नज़र आती
बात हो जाती ख़ास।
बड़े बड़े काम्प्लेक्स हों
या एक अकेला मकान 
जैसे 142 ब्लाक A 
लेक टाउन के सामान 
सारे मिल हर जश्न मनाते
छोटों का जन्मदिन हो
या बड़ों को देना हो मान।
यह सब कर पाना
हमारे आदि संस्कारों में
भर देते नित नई जान
बच्चों को सिखाते
भारत की संस्कृति को
देना उचित मान।

एक और है जो बात 
मैंने अभी नहीं कही 
यहाँ,असीम दुःख में भी 
कोई अकेला होता नहीं। 
मुश्किलें यहाँ कभी किसी
एक अकेले की होती नहीं
जब कंधे से कंधा मिल जाता
हर विपदा हो जाती सही।
अलग अलग होकर भी
संयुक्त से  हो जाते  परिवार
बच्चे सहज ही सीख जाते यहाँ
सेवा सत्कार स्नेह और प्यार।

मकान हो या काम्प्लेक्स
इनमें परिवारों का ऐसा परिप्रेक्ष्य
काश ये उमड़ कर
सैलाब बन
पूरे समाज को बहा ले जाय
पुनः संयुक्त परिवारों की ओर
बंद हो जाएँ वृद्धाश्रम चहुँ ओर।  

-रविन्द्र कुमार करनानी
30 जून 2020

7 thoughts on “वसुधैव कुटुम्बकम्”

  1. This is a thought of visionaries.
    It has power to unite all in a common thread. If more and more people start thinking in the same line, there will be no boundaries and the world will be a different place to live without hatred. It is quite powerful to develop more values and prevent war🙏

    Liked by 2 people

  2. Lovely feeling 🌼

    कविता को पढ़ कर तेरी

    सहसा ठहर गया हूँ मैं

    अनुभूति होती

    इन शब्दों से

    इन भावों से गहरा नाता मेरा🌼😃

    Liked by 1 person

    1. कॉमेंट में कविता का अनुमोदन पा
      उत्साह से भर गया हूँ मैं
      औरभी बेहतर लिख पाने का
      प्रयास दोगुना कर रहा हूँ मैं ।
      Thanks निमिष, सराहना के छोटे छोटे शब्द जीवन के हर क्षेत्र में मायने रखते हैं। और मुखर होकर सराहना भी हर कोई नहीं कर पाता। अधिकांश मन में ही खूश होकर रह जाते हैं। प्रभु तुम्हे ऐसा ही बनाये रखा। Stay blessed,.

      Liked by 1 person

      1. बहुत बातूनी और बदमाश बच्चा हूँ😅😅😍 दादा

        सभी प्रिय bloggers के comment बॉक्स पर मैं पाया जाता हूं ….

        कोई गलती करता या हो जाए तो डांट देना मुझे…छमा भी कर देना दादा😊❤❤❤ love u

        Liked by 1 person

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