Uncategorized

कथा -कैलेंडर  द्वारा 

कैलेंडर प्रायः हर घर का स्थाई सदस्य होता है|  ऐसे ही किसी कैलेंडर की कथा, व्यथा, आदर, तिरस्कार और महत्व की स्वयं की स्वयं द्वारा और किसी अन्य की भी उसके ही द्वारा !

Calendar tells its story

कथा -कैलेंडर  द्वारा 

गोल मोल हो  घर था आया 
टाँगा,जैसे सूली पर लटकाया 
पहला आवरण फाड़ गिराया 
फिर भी अपना फ़र्ज़ निभाया 
अपना दर्द न कभी  दर्शाया
तारीख वार सबको है बताया   
घर का हो या होवे  पराया | 
26 जनवरी हो गर वार रवि 
क्यों गाली देते मुझे सभी 
“रविवार को क्यूँ है आयी 
छुट्टी एक हमने है गँवाई !”

महीन ख़तम खेल ख़तम 
मेरे लिये आ जाता मातम 
फिरसे मैं हूँ फाड़ा जाता 
बिन चूँ चाँ में लटका रहता 
खुद से पूछा क्यूँ इतना सहता ?
लोगों की नज़र में है मेरी गुरुता 
महसूस करते मेरी आवश्यकता! 
घर में है और एक प्राणी 
उसकी भी सुनलो ये कहानी 
मुझसे मिलती जुलती कथा 
है उसकी कुछ अलग व्यथा 
उपेक्षित सा जब खुद को लगे 
पराये से होजायें अपने सगे 
तिरस्कृत हो कोई  कैसे  जीये 
अनादर के घूँट कब तक पीये 
मैं तो रहूंगा बस एक साल 
वो तो बसी यहाँ  सालो साल 
उसका परिचय कैसे में दूँ 
वो इस घर की “लाडली” बहू ! 
-रविन्द्र कुमार करनानी 
rkkblog1951.wordpress.com
rkkarnani@gmail.com

2 thoughts on “कथा -कैलेंडर  द्वारा ”

  1. कहीं बहु पराई सी,
    कहीं सास की आँखें नम,
    हाय रे कलेंडर
    फिर क्यों तुम करता इतना गम।
    अधिकतर यहाँ पर मतलबपरस्त,
    चहुंओर घूमकर देखा,
    ये धरती उसी की है,
    जो है ताकतवर और जबरदस्त।

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s